Rajasthan-Ke-Etihas-Ke-Strot-Abhilekh-Part-3

राजस्थान के इतिहास के स्त्रोत : अभिलेख



राजस्थान के प्रमुख अभिलेख-

चीरवा का शिलालेख ( 1273 ई . ) 


यह लेख उदयपुर के समीप चीरवा गाँव के एक मन्दिर पर लगा हुआ है । आचार्य भुवनसिंह सूरि के शिष्य रत्नप्रभासूरि ने इस लेख की रचना की और केलिसिंह ने इसे उत्कीर्ण किया । इसमें गुहिलवंशीय शासकों पद्मसिंह , जैत्रसिंह , तेजसिंह और समरसिंह की उपलब्धियों का वर्णन है । इसमें 51 श्लोक लिखे गये हैं । इसकी तिथि कार्तिक शुक्ल वि.स. 1330 है । यह लेख बागेश्वर और बागेश्वरी की आराधना से प्रारम्भ होता है । इस लेख से अनुमान लगता है कि उस समय सती प्रथा का प्रचलन था ।



रसिया की छतरी का लेख ( 1274 ई . )  


चित्तौड़ में रसिया की छतरी पर यह लेख लगा हुआ था । इसका रचयिता वेदशर्मा था । इसमें बापा से नरवर्मा तक के गुहिलवंशीय शासकों की उपलब्धियों पर प्रकाश पड़ता है ।



चित्तौड़ के पार्श्वनाथ मन्दिर का लेख ( 1278 ई . )  


इस लेख से पता चलता है कि राजा तेजसिंह की पत्नी जयतल्लदेवी ने श्यामपार्श्वनाथ मन्दिर बनवाया था । इस लेख से मेवाड़ के शासकों की धार्मिक सहिष्णुता की जानकारी मिलती है ।



अचलेश्वर का लेख ( 1285 ई . ) 


यह लेख आबू के अचलेश्वर मन्दिर के पास मठ के एक चौपाल की दीवार में लगा हुआ है । शुभचन्द्र इस लेख का लेखक व कर्मसिंह उत्कीर्णक था । इस लेख में नागदा में हारित ऋषि की तपस्या एवं उनकी कृपा से बापा को राजत्त्व की प्राप्ति तथा वापा से लेकर समरसिंह तक की वंशावली मिलती है । गंभीरी नदी के पुल का शिलालेख यह लेख मेवाड़ के शासक समरसिंह के समय का है जिसे सम्भवतः अलाउद्दीन खिलजी ने इस पुल के निर्माण के दौरान इसमें लगवा दिया । इस लेख से समरसिंह द्वारा भूमि दान देने की जानकारी मिलती है ।



श्रृंगी ऋषि का लेख ( 1428 ई . ) 


राणा मोकल के समय का यह लेख एकलिंगजी ( उदयपुर ) के समीप शृंगी ऋषि नामक स्थान से प्राप्त हुआ है । इसके रचयिता कविराज वाणीविलास योगेश्वर और उत्कीर्णक पन्ना थे । इस लेख से राणा हम्मीर की उपलब्धियों और भीलों की सामाजिक स्थिति का पता चलता है । इस लेख में राणा लाखा के बारे में कहा गया है कि उसने काशी , प्रयाग और गया ( त्रिस्थली ) में हिन्दुओं से लिए जाने वाले कर को हटवाया तथा गया में मन्दिर बनवाये । इसकी भाषा स्पष्ट है कि इसमें 30 श्लोक हैं ।



देलवाड़ा का लेख ( 1434 ई . )  


देलवाड़ा से प्राप्त इस लेख से टंक नाम की मुद्रा के प्रचलन की जानकारी मिलती है । यह लेख संस्कृत और मेवाड़ी भाषा



रणकपुर प्रशस्ति ( 1439 ई . )  


कुम्भाकालीन यह प्रशस्ति रणकपुर के चौमुखा जैन मन्दिर से मिली है । इसकी भाषा संस्कृत तथा लिपि नागरी है । यह लेख मेवाड़ के गुहिल वंश के वंशक्रम की जानकारी का महत्वपूर्ण स्रोत है । इसमें बापा तथा कालभोज को अलग - अलग व्यक्ति माना है तथा बापा को गुहिल का पिता बताया है ।

रणकपुर मंदिर निर्माता जैता नाम मिला है । इसमें बघा रावल से कुम्भा तक की जानकारी है । इसमें गुहिल को बापा का पुत्र बताया गया है ।



कुम्भलगढ़ का शिलालेख ( 1460 ई . ) 


कुम्भा की विजयों का विस्तृत वर्णन इस लेख में दिया गया है । डॉ . ओझा के अनुसार इस लेख का रचयिता महेश था । यह शिलालेख 5 शिलाओं पर लिखा है । इसमें 270 श्लोक है । इस शिलालेख में महाराणा कुम्भा द्वारा स्पादलक्ष , नाराणा , वसन्तपुरा और आबू विजय वर्णन है । इसमें एकलिंग जी मंदिर तथा कुटिला नदी का वर्णन है । ओझा के अनुसार यह प्रशस्ति महेश ने लिखी है ।



कीर्तिस्तंभ प्रशस्ति ( 1460 ई . ) 


चित्तौड़ के किले में कीर्तिस्तम्भ ( विजयस्तम्भ ) की नौवीं अर्थात् अन्तिम मंजिल पर यह प्रशस्ति उत्कीर्ण है । इस प्रशस्ति के रचयिता कवि अत्रि और महेश थे । इस लेख में कुम्भा की उपलब्धियों और उसके व्यक्तिगत गुणों , उपाधियों , संगीत ग्रन्थों आदि की विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है । * इसमें 187 श्लोक है । इसमें कुम्भा को ' दानगुरु , राजगुरु , शैल गुरु ' उपाधि दी गई ।



एकलिंगजी के मंदिर की गवमल की प्रशस्ति ( 1488 ई . ) 


महाराणा रायमल ने एकलिंग जी के मंदिर के जीर्णोद्धार के समय इस प्रशस्ति को उत्कीर्ण करवाया था । यह प्रशस्ति एकलिंगजी के मंदिर के दक्षिणी द्वार के ताक में लगी हुई है । लेख नागरी लिपि में है और भाषा संस्कृत है । इसमें कुल 101 श्लोक हैं । इसे सूत्रधार अर्जुन ने उत्कीर्ण किया था । अर्जुन की देखरेख में ही एकलिंगजी के मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया गया था । इस प्रशस्ति - लेख में हम्मीर से रायमल तक मेवाड़ के महाराणाओं की प्रमुख उपलब्धियों , दान , निर्माण , विद्योन्नति व जनता के नैतिक जीवन सहित तात्कालीन मेदपाट ( मेवाड़ ) और चित्तौड़ ( चित्रकूट ) की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन दिया गया है , जो मेवाड़ के राजनीतिक व सांस्कृतिक इतिहास की जानकारी हेतु महत्त्वपूर्ण हैं ।



बीकानेर की रायसिंह प्रशस्ति ( 1594 ई . )


 बीकानेर के दुर्ग के सूरजपोल के पार्श्व में लगी यह प्रशस्ति महाराजा रायसिंह के समय की है । इसकी भाषा संस्कृत है । इसमें बीकानेर के दुर्ग के निर्माण की जानकारी मिलती है । इस प्रशस्ति में राव बीका से रायसिंह तक के बीकानेर के शासकों की उपलब्धियों का ज्ञान होता है । इस प्रशस्ति का रचयिता जैता नामक एक जैन मुनि था । बीका से रामसिंह तक वर्णन है । इसमें रामसिंह की काबुल विजय का वर्णन है ।



आमेर का लेख ( 1612 ई . ) 


यह लेख राजा मानसिंह के समय का है जिसमें कछवाहा वंश को ' रघुवंशतिलक ' कहा गया है तथा इसमें पृथ्वीराज , उसके पुत्र भारमल , उसके पुत्र भगवंतदास और उसके पुत्र महाराजाधिराज मानसिंह के नाम क्रम से प्राप्त होते हैं । इसमें जहाँगीर के राज्य को दुहाई दी गई है , जिससे आमेर और मुगलों के संबंधों के बारे में जानकारी प्राप्त होती है । इस लेख में मानसिंह द्वारा जमवारामगढ़ के दुर्ग के निर्माण का भी उल्लेख किया गया है ।



मांडल की जगन्नाथ कछवाहा की छतरी का लेख ( 1613 ई . ) 


मांडल ( भीलवाड़ा ) में जगन्नाथ कछवाहा की बत्तीस खम्भों की छतरी स्थित है जिसे सिंहेश्वरी महादेव का मन्दिर भी कहते हैं । इसमें उल्लेख है कि मेवाड़ अभियान से लौटते समय जगन्नाथ कछवाहा का देहान्त मांडल में हुआ था , जिसके स्मारक के रूप यह छतरी बनाई गई ।



जगन्नाथ राव प्रशस्ति ( 1652 ई . ) 


यह प्रशस्ति उदयपुर के जगन्नाथ राय मन्दिर के सभामण्डप पर लगी हुई है । इस मन्दिर का निर्माण मेवाड़ महाराणा जगतसिंह प्रथम ने करवाया था । इसमें बापा से लेकर सांगा तक मेवाड़ के शासकों की उपलब्धियों का वर्णन है । इसमें हल्दीघाटी के युद्ध का भी वर्णन मिलता है ।



त्रिमुखी बावड़ी का लेख ( 1675 ई . ) 


यह प्रशस्ति देवारी के पास त्रिमुखी बावड़ी में लगी हुई है । इसमें राजसिंह के समय सर्वऋतु विलास नाम के बाग बनाये जाने , मालपुरा की विजय और लूट , चारुमति का विवाह , डूंगरपुर की विजय आदि का उल्लेख मिलता है ।



राजप्रशस्ति ( 1676 ई . ) 


मेवाड़ के महाराणा राजसिंह ( 1652-80 ई . ) ने अकाल के समय प्रजा को राहत पहुँचाने के लिए राजसमन्द नामक विशाल झील का निर्माण करवाया था । इस झील की पाल पर 25 पाषाण पट्टिकाओं पर यह प्रशस्ति उत्कीर्ण है । संस्कृत पद्य भाषा में लिखी इस प्रशस्ति का रचयिता रणछोड़ भट्ट था । राजप्रशस्ति को भारत का सबसे बड़ा शिलालेख माना जाता है । इस प्रशस्ति में मेवाड़ का विस्तृत व क्रमबद्ध इतिहास लिखा गया है । यह प्रशस्ति 17 वीं शताब्दी के मेवाड़ की सामाजिक , सांस्कृतिक , राजनीतिक , धार्मिक , तकनीकी और आर्थिक स्थिति के बारे में पर्याप्त जानकारी प्रदान करती है ।



जानासागर प्रशस्ति 


उदयपुर में बड़ी गाँव के पास है । यह महाराणा राजसिंह के समय की है । जनासागर का निर्माण राजसिंह ने अपनी माता जनादे की याद में करवाया था । इस शिलालेख में मेड़ता परिवार को वैष्णव बताया गया । इस प्रशस्ति में 41 श्लोक हैं । प्रशस्ति लक्ष्मीनाथ ने लिखी थी ।



बैराठ का लेख 


यहाँ छतरी का निर्माण सावंलदास ने करवाया यह गौड ब्राह्मण था । औरंगजेब ने इसे सिंह की उपाधि व पीपाड़ की जांगीर दी । यहाँ लेख ढूंढाड़ी भाषा में है । यहाँ छतरी का निर्माण छीतरमल की पत्नी जमना के सती होने पर करवाया था । सांवलदास छीतरमल का भतीजा था ।



घोसुन्डी शिलालेख


 चित्तौड़ में स्थित है । यह शिलालेख महाजनी लिपी व हर्षकालीन लिपी में लिखा गया है ।

Post a Comment

0 Comments