Rajasthan-Ke-Etihas-Ke-Strot-Abhilekh-Part-2

राजस्थान के इतिहास के स्त्रोत : अभिलेख





राजस्थान के प्रमुख अभिलेख-

ओसियाँ का लेख ( 956 ई . )


 यह लेख संस्कृत पद्य में है जिसे सूत्रधार पदाजा द्वारा उत्कीर्ण किया गया था । लेख में प्रतिहार शासक वत्सराज को रिपुओं का दमन करने वाला कहा है तथा उसके समय की समृद्धि पर प्रकाश डाला गया है । इससे उस समय के वर्ण विभाजन की भी जानकारी मिलती है ।



चित्तौड़ का लेख ( 971 ई . ) 


इस लेख से परमार शासकों की उपलब्धियों , उनका चित्तौड़ पर अधिकार , चित्तौड़ की समृद्धि आदि पर प्रकाश पड़ता है । इस प्रशस्ति में देवालयों में स्त्रियों के प्रवेश को निषिद्ध बतलाया है जो उस समय की ' सामाजिक व्यवस्था और धार्मिक स्तर पर भी स्त्रियों के साथ भेदभाव का परिचायक है ।


एकलिंगजी की नाथ प्रशस्ति ( 971 ई . )


 यह शिलालेख उदयपुर के एकलिंग मन्दिर के पास लकुलीश मन्दिर में लगा हुआ है । यह प्रशस्ति मेवाड़ के राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास को जानने के लिए उपयोगी है । इस प्रशस्ति के रचयिता आम्र कवि थे । गुहिल वंशी शासक नरवाहन के समय उत्कीर्ण इस लेख की भाषा संस्कृत और लिपि देवनागरी है ।



हर्षनाथ मन्दिर की प्रशस्ति ( 973 ई . ) 


यह प्रशस्ति सीकर के हर्षनाथ मन्दिर में लगी हुई है जो संस्कृत पद्य भाषा में है । इससे चौहान शासकों के वंशक्रम तथा उनकी उपलब्धियों पर प्रकाश पड़ता है । इसमें वागड़ के लिए ' वार्गट ' शब्द का प्रयोग किया गया है ।



आहड़ का देवकुलिका का लेख ( 977 ई . )  


संस्कृत भाषा में लिपिबद्ध यह लेख मेवाड़ के गुहिल शासक शक्तिकुमार के समय का है जो आहड़ के एक जैन मन्दिर की देवकुलिका के छबने में लगा हुआ है । इस लेख से मेवाड़ के तीन शासकों - अल्लट , नरवाहन और शक्तिकुमार के समय के अक्षपटलाधीशों के बारे में जानकारी प्राप्त होती है । इससे अल्लट और प्रतिहार शासक देवपाल के मध्य युद्ध पर भी प्रकाश डाला गया है , इस युद्ध में देवपाल मारा गया था । मेवाड़ के प्राचीन शासकों और शासन सम्बन्धी जानकारी के लिए यह लेख महत्त्वपूर्ण है ।



आहड़ का शक्तिकुमार का लेख ( 977 ई . )  


शक्तिकुमार के इस लेख को कर्नल टॉड अपने साथ इंग्लैण्ड ले गये , उन्होंने अपनी ' एनाल्स ' में इस लेख की विषयवस्तु का वर्णन किया है । संस्कृत भाषा के इस लेख में मेवाड़ के गुहिल शासक शक्तिकुमार की राजनीतिक प्रभुता और उसके समय में आहड़ की आर्थिक सम्पन्नता की जानकारी मिलती है । इस लेख में गुहिल शासक अल्लट की रानी हरियादेवी को हूण राजा की पुत्री बताया गया है जिसने हर्षपुर नामक ग्राम बसाया था । इस लेख में गुहदत्त से शक्तिकुमार तक पूरी वंशावली दी गई है जो मेवाड़ के प्राचीन इतिहास के लिए महत्त्वपूर्ण है ।



जालौर का लेख ( 1118 ई . ) 


यह लेख जालौर में तोपखाना की इमारत की उत्तरी दीवार पर लगा हुआ था , वर्तमान में जोधपुर के संग्रहालय में रखा हुआ है । यह जालौर के परमारों से सम्बन्धित है तथा बताया गया है कि परमारों की उत्पत्ति वशिष्ठ के यज्ञ से हुई थी । इस लेख में जालौर के परमार वंश के संस्थापक वाक्पतिराज का उल्लेख है ।



चित्तौड़ का कुमारपाल का शिलालेख ( 1150 ई . ) 


चालुक्य ( सोलंकी ) शासक कुमारपाल का यह लेख चित्तौड़ के समिद्धेश्वर मन्दिर में लगा हुआ है । इस लेख में चालुक्यों का यशोगान करते हुए मूलराज और सिद्धराज का वर्णन किया गया है । इस लेख से सिद्ध होता है कि चित्तौड़ पर कुछ समय चालुक्यों का शासन रहा था । इस प्रशस्ति का रचयिता दिगंबर जैन विद्वान रामकीर्ति था ।



किराडू का लेख ( 1152 ई . ) 


यह लेख किराडू ( बाड़मेर ) के निकट एक शिवमन्दिर में उत्कीर्ण है । यह लेख एक प्रकार से राजाज्ञा है जिसमें चौहान सामंत आल्हणदेव ने मास के दोनों पक्षों की अष्टमी , एकादशी और चतुर्दशी पर पशुवध निषेध घोषित कर दिया था । दंडस्वरूप सर्वसाधारण से 5 द्रम और राज्य परिवार के व्यक्ति से 1 द्रम लेने की व्यवस्था से स्पष्ट है कि विशेष अधिकार को उस युग में मान्यता दी जाती थी । इस लेख में विभिन्न प्रकार के पदाधिकारियों का भी उल्लेख मिलता है ।



बिजौलिया शिलालेख ( 1170 ई . ) 


यह शिलालेख बिजौलिया के पार्श्वनाथ मन्दिर के समीप एक चट्टान पर उत्कीर्ण है । इस प्रशस्ति का रचयिता गुणभद्र था तथा गोविन्द ने इसको उत्कीर्ण किया । इसमें साँभर और अजमेर के चौहान वंश की सूची तथा उनकी उपलब्धियों की जानकारी मिलती है । लेख में चौहान शासकों को वत्सगोत्रीय ब्राह्मण कहा गया है । बिजौलिया क्षेत्र जिसे ऊपरमाल भी कहा जाता है , को इस लेख में ' उत्तमाद्रि ' कहा गया है । अनेक क्षेत्रों के प्राचीन नाम भी इस लेख से प्राप्त होते हैं । इस शिलालेख की भाषा संस्कृत है । इसमें 13 पद हैं । मूलतः यह लेख दिगम्बर लेख है , जिसको दिगम्बर जैन श्रावक लोलाक ने पार्श्वनाथ मंदिर कुण्ड निर्माण स्मृति लिखवाया , इसमें देवालय निर्माण के अतिरिक्त चौहान वंश की जानकारी है । इस शिलालेख में जालौर का नाम जाबालिपुर , सांभर का नाम शांकम्बरी व भीनमाल का नाम श्रीमाल मिलता है । टॉड के अनुसार बिजौलिया का वास्तविक नाम ' बिजयावल्ली ' था ।





नादेसमाँ गाँव का लेख ( 1222 ई . ) 


यह लेख उदयपुर जिले के नादेसमाँ गाँव के चारभुजा मन्दिर के निकट टूटे हुए सूर्यमन्दिर के एक स्तम्भ पर उत्कीर्ण है । इस लेख से पता चलता है कि जैत्रसिंह की राजधानी नागदा थी । इससे स्पष्ट है कि 1222 ई . तक नागदा नगर नष्ट नहीं हुआ था ।

लूणवसाही की प्रशस्ति ( 1230 ई . )


 यह प्रशस्ति देलवाड़ा के लूणवसाही मन्दिर की है जो संस्कृत भाषा में है और पद्य में लिखी गई है । इस लेख से आबू के परमार शासकों और तेजपाल व वास्तुपाल के वंश के बारे में जानकारी प्राप्त होती है । इससे पता चलता है कि आबू के परमार शासक सोमसिंह के समय में मंत्री वास्तुपाल के छोटे भाई तेजपाल ने लूणवसाही नामक नेमिनाथ का मन्दिर अपनी स्त्री अनुपमा देवी के श्रेय के लिए बनवाया था ।



बीठू गाँव का लेख ( 1273 ई . ) 


पाली के पास बीठू गाँव में यह लेख प्राप्त हुआ है । इस लेख से राव सीहा के व्यक्तित्व और उसकी मृत्यु की तिथि निश्चित करने में मदद मिलती है । इस लेख के अनुसार मारवाड़ के राठौड़ों का आदिपुरुष सीहा सेतकुँवर का पुत्र था । उसकी पत्नी पार्वती ने उसकी मृत्यु पर देवल का निर्माण करवाया था । बीठू गाँव के उक्त देवल पर ही यह लेख उत्कीर्ण है । इस लेख के ऊपरी भाग में अश्वारोही सीहा को शत्रु पर भाला मारते हुए दर्शाया है ।


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