Rajasthan Ke Etihas Ke Strot Abhilekh Part-1



राजस्थान के इतिहास के स्त्रोत : अभिलेख







राजस्थान के प्रमुख अभिलेख-


उत्कीर्ण अभिलेखों के अध्ययन को ' एपीग्राफी ' ( पुरालेखशास्त्र ) कहा जाता है।

अभिलेखों एवं दूसरे पुराने दस्तावेजों की प्राचीन लिपि का अध्ययन ' पेलियोग्राफी ' ( पुरालिपिशास्त्र ) कहलाता है।

भारतीय लिपियों पर पहला वैज्ञानिक अध्ययन डॉ . गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने किया।

श्री ओझा ने भारतीय लिपियों पर ' भारतीय प्राचीन लिपिमाला ' पुस्तक की रचना की|



घोसुन्डी शिलालेख (द्वितीय शताब्दी ई.पू.)

 द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व का यह लेख नगरी ( चित्तौड़ ) के समीप घोसुन्डी ग्राम से प्राप्त हुआ है । इस शिलालेख का महत्त्व द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व में भागवत धर्म का प्रसार , संकर्षण और वासुदेव की मान्यता तथा अश्वमेध यज्ञ का प्रचलन आदि से है। इस प्रकार भागवत धर्म के प्रचलन की जानकारी देने वाला यह राजस्थान में प्राचीनतम प्रमाण है।



नांदसा यूप - स्तम्भ लेख ( 225 ई . ) 


भीलवाड़ा जिले में स्थित इस यूप - स्तम्भ की स्थापना 225 ई . में की गई थी । इस लेख से पता चलता है कि शक्तिगुणगुरु नामक व्यक्ति ने यहाँ षष्ठिरात्र ( छ : रातों में सम्पन्न ) यज्ञ किया था । इस स्तम्भ की स्थापना पश्चिमी ( शक ) क्षत्रपों के राज्य - काल में सोम द्वारा की गई थी



बड़वा स्तम्भ लेख ( 238-39 ई . ) - 


बारां जिले में अन्ता के समीप बड़वा ग्राम से 238-239 ई . के ( पूर्व गुप्तकालीन ) तीन यूप - स्तम्भ लेख प्राप्त हुए हैं । इनमें त्रिरात्र यज्ञों का उल्लेख है जिन्हें बलवर्धन , सोमदेव तथा बलसिंह नामक तीन भाइयों ने सम्पादित किया था । एक अन्य लेख में मौखरी वंशी धनत्रात द्वारा किये गये अप्तॊयाम ( एक पूरे दिन के बाद दूसरे दिन तक चलने वाला ) यज्ञ का उल्लेख है ।



गंगधार का लेख ( 423 ई . ) - 


यह लेख झालावाड़ जिले में गंगधार नामक स्थान से प्राप्त हुआ है जिसकी भाषा संस्कृत है । इस लेख के अनुसार राजा - विश्वकर्मा के मंत्री मयूराक्ष ने एक विष्णु मन्दिर का निर्माण करवाया था । उसने तांत्रिक शैली का मातृगृह और एक बावड़ी का भी निर्माण करवाया था । इस लेख से . पाँचवीं शताब्दी की सामंती व्यवस्था के बारे में भी जानकारी प्राप्त होती है ।


भ्रमरमाता का लेख ( 490 ई . ) - 


छोटी सादड़ी ( प्रतापगढ़ ) के भ्रमरमाता मन्दिर से प्राप्त इस लेख की तिथि 490 ई . है । संस्कृत पद्य में लिखित इस प्रशस्ति का रचयिता ब्रह्मसोम और उत्कीर्णक पूर्वा था । इसमें गौर वंश और औलिकर वंश के शासकों का वर्णन है । यह लेख प्रारम्भिक सामन्त प्रथा और पाँचवीं शताब्दी की राजनीतिक स्थिति की जानकारी के लिए महत्त्वपूर्ण है ।



सांमोली शिलालेख ( 646 ई . ) - 


उदयपुर जिले के सांमोली ग्राम से प्राप्त यह लेख गुहिल वंश के शासक शिलादित्य के समय का है । मेवाड़ के गुहिल वंश के समय को निश्चित करने तथा उस समय की आर्थिक और साहित्यिक स्थिति की जानकारी के लिए यह लेख विशेष महत्त्वपूर्ण है ।



अपराजित का शिलालेख ( 661 ई . ) - 


वि . सं . 718 ( 661 ई . ) का यह लेख नागदा के समीपस्थ कुंडेश्वर मन्दिर की दीवार पर लगा हुआ था , जिसे डॉ . गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने विक्टोरिया हॉल म्यूजियम ( अजमेर ) में सुरक्षित रखवाया । लेख की भाषा संस्कृत है । गुहिल शासक अपराजित के इस लेख से गुहिलों की उत्तरोत्तर विजयों के बारे में सूचना प्राप्त होती है । लेखानुसार अपराजित ने एक तेजस्वी शासक वराहसिंह को पराजित कर उसे अपना सेनापति नियुक्त किया था । इसमें विष्णु मन्दिर के निर्माण का भी उल्लेख है । इस लेख की सुन्दर लिपि तथा स्पष्ट भाषा से मेवाड़ में विकसित शिल्पकला का पता चलता है । इससे 7 वीं शताब्दी के मेवाड़ की धार्मिक तथा राजनैतिक व्यवस्था के बारे में भी महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है । इस प्रशस्ति की रचना दामोदर ने की और इसे यशोभट्ट ने उत्कीर्ण किया था ।



चित्तौड़ का मानमोरी का लेख ( 713 ई . ) 


713 ई . का यह लेख चित्तौड़ के पास मानसरोवर झील के तट पर कर्नल टॉड को प्राप्त हुआ था । इसके रचयिता पुष्प और उत्कीर्णक शिवादित्य थे । जेम्स टॉड ने इस लेख को ब्रिटेन ले जाते समय किसी कारणवश समुद्र में फेंक दिया था , परिणामस्वरूप इस लेख की प्रतिलिपि केवल टॉड की पुस्तक एनाल्स में मिलती है।



कणसवा ( कंसुआ ) का लेख ( 738 ई . ) 


यह लेख कोटा के निकट कंसुआ के शिवालय से मिला है जिसकी तिथि 738 ई . है । इस लेख में धवल नाम के मौर्य शासक का उल्लेख है । इसके बाद किसी मौर्यवंशी राजा का राजस्थान में वर्णन नहीं मिलता है ।



चांटसू की प्रशस्ति ( 813 ई . ) 


यह प्रशस्ति जयपुर जिले के चाटसू नामक स्थान से प्राप्त हुई है , जिसमें चाटसू के गुहिल शासकों की वंश परम्परा और उपलब्धियों की जानकारी प्राप्त होती है । इस लेख से पता चलता है कि चाटसू के गुहिल प्रतिहार वंश के शासकों के अधीन थे । इस वंश में मेवाड़ के गुहिलों की भाँति शिवभक्ति और विष्णुभक्ति का प्रचलन था । 

बुचकला शिलालेख ( 815 ई . ) 


जोधपुर जिले में बिलाड़ा के समीप बुचकला गाँव के पार्वती मन्दिर में यह शिलालेख मिला है । इसकी भाषा संस्कृत पद्य है । यह लेख प्रतिहार शासक नागभट्ट द्वितीय के समय का है । इस लेख में प्रतिहार वंश के शासकों और सामन्तों के नाम मिलते हैं , जिससे उस समय के शासकों और सामन्तों के सम्बन्ध और स्तर का अनुमान लगाया जा सकता है ।



मण्डोर का शिलालेख ( 837 ई . ) 


यह लेख मूलतः मण्डोर के विष्णुमन्दिर में लगा हुआ था जिसे बाद में जोधपुर के शहरपनाह में लगा दिया गया । यह लेख मण्डोर के प्रतिहारों की वंश परम्परा जानने के लिए महत्त्वपूर्ण है ।



घटियाला का शिलालेख ( 861 ई . ) 


जोधपुर से 22 मील दूर घटियाला नामक स्थान पर एक जैन मन्दिर जिसे ' माता की साल ' कहते हैं , के समीप स्थित स्तम्भ पर चार लेखों का समूह है । लेख की भाषा संस्कृत है जिसमें गद्य और पद्य का प्रयोग किया गया है । इस लेख में प्रतिहार शासकों , मुख्यतः कक्कुक प्रतिहार की उपलब्धियों और राजनीतिक , सामाजिक व धार्मिक नीतियों के बारे में सूचना प्राप्त होती है । इस लेख में ' मग ' जाति के ब्राह्मणों का भी विशेष उल्लेख किया गया है जो वर्ण विभाजन का द्योतक है । ' मग ' ब्राह्मण ओसवालों के आश्रय में रहकर निर्वाह करते थे तथा जैन मन्दिरों में भी पूजा सम्पन्न करवाते थे । ये लेख मग द्वारा लिखे गये तथा स्वर्णकार कृष्णेश्वर द्वारा उत्कीर्ण किये गये थे ।



घटियाला के दो अन्य लेख ( 861 ई . ) 


यह लेख भी मंडोर के प्रतिहार शासक कक्कुक के समय का । इस लेख में हरिश्चन्द्र से प्रारम्भ कर कक्कुक तक के मंडोर के प्रतिहारों की वंशावली तथा उनकी उपलब्धियों का उल्लेख किया गया है । इस लेख का अन्तिम श्लोक स्वयं कक्कुक ने लिखा था जिससे प्रतिहार शासकों की विद्वता की जानकारी मिलती है ।



सारणेश्वर प्रशस्ति ( 953 ई . ) 


यह प्रशस्ति उदयपुर के श्मशान के सारणेश्वर नामक शिवालय के पश्चिमी द्वार के छवने पर लगी हुई है । इसकी भाषा संस्कृत और लिपि नागरी है । इस प्रशस्ति से तत्कालीन शासन तथा कर व्यवस्था पर प्रकाश पड़ता है । इसमें मेवाड़ के गुहिलवंशी राजा अल्लट और उसके पुत्र नरवाहन एवं मुख्य कर्मचारियों के नाम उनके पद सहित दिये गये हैं । इस प्रशस्ति के लिपिकार कायस्थ पाल और वेलक थे ।



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